हिमाचल विधान सभा का सत्र बढ़ाने की सुगबुगाहट, आपदा चारों ओर और लीडर सदन में एक दूसरे पर शब्द वाण दागने के इच्छुक, आवश्यकता है कि फील्ड में जाकर अपनी जनता के साथ दुख-दर्द बांटा जाय न कि विधान सभा में बैठकर एक दूसरे पर व्यंग्य कसने और हो हल्ला करने का,प्राकृतिक आपदा राहत और बचाव पुनर्वास के लिए जनप्रतिनिधि जनता के साथ जुड़ें ऐसी अपेक्षा है,न कि सत्र बढ़ाकर शिमला में आराम किया जाय।
हिमाचल विधान सभा में सत्र बढ़ाने की सुगबुगाहट कयों?आपदा जमीन पर और चर्चा विधान सभा के भीतर का क्या मतलव है?आवश्यकता इस बात की थी कि जब पूरा हिमाचल आपदा के दर्द से कराह रहा था उसी समय विधान सभा स्थगित कर जनता के साथ दुख दर्द बांटा जाता लेकिन हो रहा है इसका उल्टा,लेकिन मालिक तो सदन में बैठे लोग ही हैं हमारी कौन सुनेगा।
गणेश दत्त।
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