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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल,स॔घ के लिए गौरव के पल और विरोधियों के लिए एक खींज,ऐसे नहीं बना स॔घ विश्व का नम्बर एक संघठन, 100 साल में कितने ऋषि तुल्य प्रचारक,भूखे प्यासे रहकर राष्ट्र भक्ति संस्कारवान समाज के जागरण के लिए कैसे कैसे कैसे लोहे के चने चबाते रहे ,विश्वनीयता के प्रतीक बन कर समाज का विश्वास बने ,संकटकाल में आपदा से जूझते हुए नरसेवा में तत्पर रहे,समाज सहयोग से आगे बढ़े और सरकार के आगे सहायता के लिए कभी नहीं गिड़गिड़ये ,स्वयंसेवक के परिश्रम के अंशदान से संगठन भी आगे बढ़ा और स॔घ यश्श्वी हुआ, 100 साल की यात्रा में भागीदार सभी को साधुवाद।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष ,क्या ऐसे हो गये स॔घ के 100 वर्ष, हम शौभाग्यशाली हैं जो स॔घ की शताब्दी मना रहे हैं,हम् कृतज्ञ हैं उन असंख्य ऋषि तुल्य प्रचारकों के जिन्होंने बसों में धक्के खाकर,पैदल चलकर समाज में हिन्दुत्व और मानवता की अलख जगाई, भूखे प्यासे रहकर अपने जीवन व परिवार की परवाह न कर रात-दिन अविरल चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पौधे को वटवृक्ष का स्वरूप प्रदान किया,आज स॔घ विश्व का नंबर एक संगठन है,बिना सरकारी सहायता से चलने वाला संगठन,  स्वयंसेवक  के परमार्थ रुदक्षिणा से स॔घ चलता है,कोई धनाढ यह नहीं कह सकता कि स॔घ मेरे कारण चलता है।यह ठीक है कि स॔घ के आनुषंगिक संगठन समय समय पर समाज का सहयोग अवश्य लेते हैं लेकिन बिना अहसान के ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक के शताब्दी वर्ष पर सभी स्वयंसेवकों को कोटि सह बधाई।

गणेश दत्त।

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